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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भगवान रामचंद्र जी की मूर्ति से जुड़े एक संपत्ति विवाद की सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि यदि किसी मूर्ति की विधिवत स्थापना और प्राण-प्रतिष्ठा ही नहीं हुई है, तो उसे कानून की नजर में ऐसा न्यायिक व्यक्तित्व नहीं माना जा सकता, जिसके नाम पर संपत्ति का अधिकार या मुकदमा चलाने की क्षमता हो।
यह आदेश न्यायमूर्ति अनिल कुमार दशम की एकलपीठ ने मूर्ति श्री राम चंद्र जी विराजमान एवं छह अन्य की ओर से दाखिल द्वितीय अपील पर सुनाया। विवाद मिर्जापुर जिले की एक संपत्ति से संबंधित है, जिसका संबंध वर्ष 1949 में की गई एक गिफ्ट डीड से बताया गया है।
मामले के अनुसार, दानपत्र में संबंधित भूमि पर भगवान राम की मूर्ति स्थापित किए जाने की शर्त का उल्लेख था। इसके साथ ही संपत्ति से होने वाली आय का व्यक्तिगत उपयोग नहीं करने तथा संपत्ति के स्वामित्व संबंधी स्वरूप में बदलाव न करने की बात भी कही गई थी। बाद में अपीलकर्ताओं ने स्वयं को भगवान रामचंद्र जी का ‘नेक्स्ट फ्रेंड’ बताते हुए संपत्ति के प्रबंधन और उसके कथित हस्तांतरण को चुनौती दी।
वहीं, विपक्ष की ओर से अदालत में दलील दी गई कि गिफ्ट डीड में मूर्ति स्थापित करने की बात होने के बावजूद मौके पर न तो मंदिर का निर्माण हुआ और न ही भगवान राम की मूर्ति स्थापित की गई। विपक्ष के अनुसार, संबंधित लोग लंबे समय से संपत्ति पर कब्जे में हैं और उसका उपयोग करते आ रहे हैं। संपत्ति के कुछ हिस्सों के हस्तांतरण की बात भी अदालत के समक्ष रखी गई।
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी, अमृतसर बनाम श्रीसोम नाथ दास मामले में दिए गए फैसले का भी संदर्भ लिया। अदालत ने माना कि किसी मूर्ति को न्यायिक व्यक्ति का दर्जा मिलने के लिए उसकी विधिवत स्थापना और प्राण-प्रतिष्ठा महत्वपूर्ण है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल किसी धार्मिक देवता के प्रति आस्था या श्रद्धा रखने मात्र से किसी व्यक्ति को निजी संपत्ति के स्वामित्व अथवा उसके प्रबंधन को चुनौती देने का स्वतः अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता।
मामले में अदालत ने यह तथ्य भी ध्यान में रखा कि गिफ्ट स्वीकार करने वाले कैलाश नाथ अग्रवाल और उनके उत्तराधिकारी लंबे समय तक संपत्ति के कब्जे एवं प्रबंधन में रहे। राजस्व अभिलेखों में भी उनके नाम दर्ज होने की बात सामने आई।
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को धार्मिक आस्था, मूर्ति के विधिक व्यक्तित्व और संपत्ति अधिकार से जुड़े मामलों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।








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